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कठुआ: आरोपियों के वकील ने एक ऐसी बात खोजी है, जिसके बाद किसी को समझ नहीं आ रहा कि क्या कहें

क्या आपका पेशा आपको इतना मजबूर बना सकता है कि आप बेहूदे बन जाएं? कि आपकी अक्ल पर कीचड़ पड़ जाए? आप मुंह खोलें और गंदगी उगलें?
हमारे इधर कहावत है. इहै मुंह पान खुआबै छै, इहै मुंह जूत्तो खुउाबै छै. मतलब, यही मुंह पान भी खिलाता है और यही मुंह जूते भी खिलाता है. यानी आप जैसी बात करेंगे, जैसा बर्ताव करेंगे, वैसा ही बर्ताव पाएंगे. इसका मतलब और ढंग से समझने के लिए आप अंकुर शर्मा की बात सुनिए. ये जनाब कठुआ गैंगरेप और मर्डर केस में आरोपियों के वकील हैं. इन्होंने पुलिस की जांच टीम की अगुआई कर रही महिला पुलिस अफसर श्वेतांबरी शर्मा के बारे में कहा है:
श्वेतांबरी क्या है, लड़की है. उसका कितना ही दिमाग होगा. वो नई अफसर है. थोड़ी-बहुत चीजें दिखाकर कुछ लोगों ने उसे यकीन दिला दिया है कि क्राइम ऐसे हुआ होगा.
बाएं से कठुआ केस की जांच करने वाली वो पुलिस अधिकारी, वो बच्ची और आरोपियों के वकील
अंकुर ने कहा कि श्वेतांबरी एक औरत है और नई अधिकारी है. इसीलिए जरूर किसी ने उसे गुमराह किया होगा. मतलब- औरतों को गुमराह किया जा सकता है. उन्हें पट्टी पढ़ाई जा सकती है.
कठुआ में बच्ची के गैंगरेप और मर्डर के बाद देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन हुए.

बस इसलिए कि श्वेतांबरी औरत हैंपुलिस की जिस टीम ने कठुआ गैंगरेप-मर्डर की तफ्तीश की है, उसकी इकलौती महिला अधिकारी हैं श्वेतांबरी. अगली बार जब आपको ये लगे कि औरतें के साथ अब भेद-भाव नहीं होता और चीजें बदल गई हैं, तो श्वेतांबरी को याद कर लीजिएगा. बस अंकुर शर्मा की बेहूदगी नहीं. उस औरत को बस औरत होने की वजह से जांच के दौरान बहुत मुश्किलें झेलनी पड़ीं. उन्हें धमकियां मिलीं. उन्हें याद दिलाया गया कि वो खुद ब्राह्मण होकर भी ब्राह्मणों के खिलाफ (ज्यादातर आरोपी इसी जाति के हैं) क्यों कार्रवाई कर रही हैं. ऐसी ही बेहूदगी उस बच्ची का केस लड़ रही वकील दीपिका सिंह राजवंत के साथ हुई थीं. उन्होंने अपने रेप-मर्डर की आशंका जताई थी.

कठुआ केस का एक आरोपी सांजी राम
वकील होकर ये हाल हैवकील का काम अपने मुवक्किल को बचाना होता है. इसी में उसकी रोजी-रोटी होती है. इतने तक तो समझ आता है. लेकिन ये बेहूदगी? पुलिस टीम में और भी लोग हैं. लेकिन अंकुर शर्मा को बस श्वेतांबरी की समझ पर ही शक है. क्यों? क्योंकि उसको लगता है कि औरतें एवें ही होती हैं. उनमें दिमाग नहीं होता. वकील बनने के लिए इस आदमी ने कानून की पढ़ाई की होगी. फिर भी इसको न जेंडर राइट्स समझ आया और न ह्यूमन राइट्स. पुलिस और सिस्टम की आलोचना का तरीका भी नहीं आया. मुंह से गंदगी ही उगलनी थी, तो इतना पढ़ने-लिखने की क्या जरूरत थी?


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